मां दुर्गा को ‘महिषासुर मर्दिनी’ 22 सितंबर से नवरात्रि का शुभारंभ हो रहा है। इन नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ दिव्य स्वरूपों की पूजा और उपासना की जाती है। प्रत्येक दिन देवी के एक विशेष रूप को समर्पित होता है, और भक्तगण व्रत रखकर उनका आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।

मां दुर्गा को ‘महिषासुर मर्दिनी’ — यानी महिषासुर का संहार करने वाली के रूप में भी पूजा जाता है। यह रूप शक्ति, साहस और अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक है। श्री दुर्गा सप्तशती के तीसरे और चौथे अध्याय में इस महान युद्ध का विस्तृत वर्णन मिलता है, जिसमें देवी ने महिषासुर जैसे बलशाली राक्षस का वध कर त्रिलोक की रक्षा की थी।
महिषासुर कौन था ?
महिषासुर एक अत्यंत शक्तिशाली असुर था, जो रम्भासुर का पुत्र था। उसकी उत्पत्ति एक पुरुष और एक महिषी (भैंस) के संयोग से हुई थी, इसलिए उसका नाम महिषासुर पड़ा।
अमरता की इच्छा से महिषासुर ने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या की। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्माजी हंस पर सवार होकर उसके सामने प्रकट हुए और बोले, “वत्स, उठो और जो भी वरदान चाहिए, मांगो।”
महिषासुर ने अमर होने का वरदान माँगा। इस पर ब्रह्माजी ने समझाया कि जो भी जन्म लेता है, उसकी मृत्यु निश्चित होती है, इसलिए वे उसे अमरता का वर नहीं दे सकते।
इस पर महिषासुर ने चतुराई से वर माँगा कि उसकी मृत्यु न तो किसी देवता के हाथों हो, न किसी असुर या मनुष्य के द्वारा — केवल किसी स्त्री के हाथों ही उसकी मृत्यु संभव हो।
ब्रह्माजी ने ‘एवमस्तु’ कहकर उसे यह वरदान दिया और अपने लोक चले गए।
महिषासुर का वध क्यों करना पड़ा : माँ दुर्गा को
महिषासुर ने घोर तपस्या करके ब्रह्मा से वर प्राप्त किया, जिसके फलस्वरूप वह समस्त दैत्यों का राजा बन गया और उसने एक विशाल असुर सेना का गठन किया। वरदान के मद में चूर होकर उसने पहले पाताल लोक, फिर मृत्युलोक और अंत में इन्द्रलोक (स्वर्ग) पर आक्रमण कर दिया। इस महासंग्राम में भगवान विष्णु और भगवान शिव ने भी देवताओं की सहायता की, परंतु वे भी महिषासुर से पराजित हो गए। अंततः महिषासुर ने तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया और त्रिलोकाधिपति बन बैठा। उसकी बढ़ती हुई अत्याचारों से पीड़ित होकर देवताओं ने भगवान विष्णु के नेतृत्व में भगवती महाशक्ति की आराधना की। सभी देवताओं के तेज से एक परमसुन्दरी देवी प्रकट हुईं, जिन्हें महामाया दुर्गा कहा गया। हिमवान पर्वतराज ने देवी को सिंह वाहन के रूप में प्रदान किया, और सभी देवताओं ने उन्हें अपने-अपने दिव्य अस्त्र-शस्त्र अर्पित किए। देवी कात्यायनी रूप में शस्त्रों से सज्जित होकर हिमालय पर पहुंचीं और अट्टहास करते हुए घोर गर्जना की, जिसकी ध्वनि सुनकर महिषासुर की सेना युद्ध के लिए आगे बढ़ी। इसके बाद देवी और असुरों के बीच भीषण युद्ध हुआ, जिसमें महिषासुर के समस्त सेनापति और असुर एक-एक कर मारे गए। अंततः महिषासुर स्वयं युद्धभूमि में उतरा और अनेक मायावी रूप धारण करके देवी को छलपूर्वक पराजित करने का प्रयास किया, परंतु देवी दुर्गा ने अपने चक्र से उसका सिर काटकर उसका अंत कर दिया।
माँ दुर्गा के नौ रूप क्या हैं?
देवी दुर्गा के नौ रूपों को सामूहिक रूप से नव दुर्गा कहा जाता है, और नौ रूप इस प्रकार हैं:
- शैलपुत्री – पर्वतराज हिमालय की पुत्री, यह शक्ति का प्रारंभिक स्वरूप हैं। नंदी पर सवार, हाथों में त्रिशूल और कमल लिए होती हैं।
- ब्रह्मचारिणी – तपस्या और ज्ञान की प्रतीक। हाथों में जपमाला और कमंडल होता है। संयम और साधना की मूर्ति हैं।
- चंद्रघंटा – इनके मस्तक पर अर्धचंद्र है, और घंटे जैसी आकृति होती है। यह रूप शक्ति, सौंदर्य और साहस का मेल है।
- कुष्मांडा – सृष्टि की जननी मानी जाती हैं। इनका एक मुस्कान से ब्रह्मांड की रचना हुई। अष्टभुजा और सिंहवाहिनी हैं।
- स्कंदमाता – भगवान कार्तिकेय (स्कंद) की माता। बालक स्कंद को गोद में लेकर, ममता और वीरता दोनों की प्रतीक हैं।
- कात्यायनी – ऋषि कात्यायन की तपस्या से उत्पन्न हुईं। राक्षसों का संहार करने वाली, युद्ध की देवी के रूप में पूजी जाती हैं।
- कालरात्रि – अंधकार और बुराई का नाश करने वाली। इनका स्वरूप भयावह है, परंतु यह भक्तों को अभय देती हैं।
- महागौरी – अत्यंत श्वेत, शांत और सौम्य रूप। तपस्या के बाद इन्होंने यह उज्ज्वल रूप प्राप्त किया। शांति और पवित्रता की प्रतीक हैं।
- सिद्धिदात्री – सिद्धियाँ और ज्ञान देने वाली देवी। सभी देवताओं और ऋषियों को सिद्धियाँ प्रदान करने वाली अंतिम रूप हैं।